गुरुवार, 5 मई 2011

"तुम पे, क्या लिखूं"

सुना है, 
तुम लिखते भी हो, 
उसने पूछा था | 
हूँ ! 
मैंने कहा था | 
कुछ मेरे पे लिखो, 
प्यार भरी आँखों, 
से गुदगुदाया, 
तनिक मुझे, 
और उंगलियाँ, 
पकड़ ली थी मेरी | 
गोया, 
उनमें से हर्फ़  निकलेंगे अभी, 
और वो उन्हें, 
अपने इर्द गिर्द, 
समेट  लेगी,
और बना  लेगी,
लिबास,
एक नज़्म  का |
मैंने कहा था, 
हाँ,पर उसके लिए,
तुम्हे जानना होगा, मुझे |
पर, 
मै जब भी,
कोशिश करता हूँ,
जानने  की  तुमको,
तुम, 
मेरे  ख्यालों  की  ही, 
हकीकत  सी  लगती हो |
तुम पे कैसे लिखूं, 
तुम तो 'स्टेंसिल'  हो,
मेरी नज्मों  की,
मेरी ग़ज़लों की |
समय तुमसे ही,
छन कर,
आता है, 
और, 
छपता सा  जाता है, 
सफों पे, 
ज़िन्दगी के मेरी |
तुम तो खुद में, 
एक लफ्ज़  हो,
इबारत हो, 
तबस्सुम  हो, 
एक मिज़ाज हो |
जब भी लौटा  हूँ, 
पास से तेरे, 
कभी नज़्म,
तो, 
कभी ग़ज़ल,
ही,  
छपी मिली है, 
दिल पे मेरे |  
तुम पे, 
क्या लिखूं, 
और कैसे लिखूं ?
   

30 टिप्‍पणियां:

  1. .तुम पर क्या लिखूँ.... तुम तो अबूझ किताब हो
    बेहतरीन !

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  2. कुछ भी लिखना अधूरा सा लगने लगता है तब

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  3. मेरे ख्यालों की ही,
    हकीकत सी लगती हो |
    तुम पे कैसे लिखूं,
    तुम तो 'स्टेंसिल' हो,
    मेरे नज्मों की |
    समय तुमसे ही,
    छन कर,
    आता है,
    और,
    छपता जाता है,
    सफों पे,
    मेरी ज़िन्दगी के |


    जिन्दगी का हर लम्हा,हर एहसास और हर शख्स
    एक स्टेंसिल की तरह ही है..जो जिन्दगी के पन्ने पर
    कुछ न कुछ उकेर जाता है अच्छा भी बुरा भी....
    और हम ताउम्र उसे पढ़ते रहते हैं,उसके बारे में लिखते रहते हैं
    हाँ !! ये हमें सीख जरूर दे जाते हैं जीवन जीने के लिए...

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  4. जब भी लौटा हूँ,
    पास से तेरे,
    कभी नज़्म,
    तो,
    कभी ग़ज़ल,
    ही,
    छपी मिली है,
    दिल पे मेरे |
    तुम पे,
    क्या लिखूं,
    और कैसे लिखूं ?

    खूबसूरत अभिव्यक्ति..
    हर ऐसा एहसास कुछ न कुछ लिखने को बाध्य करता है..

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  5. तुम तो खुद में,
    एक लफ्ज़ हो,
    तबस्सुम हो,
    एक मिज़ाज हो |

    बहुत ही खूबसूरत शब्दों से सजी सुन्दर रचना!
    बेहतरीन!

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  6. तुम पे कैसे लिखूं,
    तुम तो 'स्टेंसिल' हो,
    मेरी नज्मों की,
    मेरी ग़ज़लों की

    वाह! अमित जी ,बहुत खूब लिखा है.दिल को छू गयी आपकी नज़्म.

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  7. amit ji namaskar
    aapki iss rachna ne dil ko chu liya
    dil ko chu lene wali behetrin rachna
    aapka aabhar

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  8. तुम तो खुद में,
    एक लफ्ज़ हो,
    तबस्सुम हो,
    एक मिज़ाज हो |...jo bhi jiya hai tumse jiya hai, jo bhi likha hai, tumhen chhuker likha hai... ab aur kya likhun

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  9. मै जब भी,
    कोशिश करता हूँ,
    जानने की तुमको,
    तुम,
    मेरे ख्यालों की ही,
    हकीकत सी लगती हो |bhut khbsurat rachna...

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  10. वाह जी वाह …………गज़ब्……………जब गज़ल खुद गज़ल बन जाये तो फिर कौन किस पर क्या लिखे? बहुत खूब्…………बहुत पसन्द आई।

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  11. खुबसूरत अहसास और उनकी अभिव्यक्ति बधाई स्वीकार करें

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  12. खूबसूरत अभिव्यक्ति..को छू गयी आपकी नज़्म

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  13. कभी नज़्म,
    तो,
    कभी ग़ज़ल,
    ही,
    छपी मिली है,
    दिल पे मेरे |
    तुम पे,
    क्या लिखूं,
    और कैसे लिखूं ?

    खूब लिखा है.

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  14. तुम तो खुद में,
    एक लफ्ज हो
    इबारत हो,
    तब्बसुम हो,
    एक मिजाज हो !
    बहुत सुंदर अमित जी,
    वैसे यूँ खंड-खंड में कविता को
    पसंद करना अच्छी बात नहीं
    वह तो अपने आप में संपूर्ण है !
    सुंदर है.............

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  15. तुम.... तुम ऐसी इबारत हो जो एक साथ एक लफ़्ज़, एक वाक्य, एक पैरा और एक लेख हो :)

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  16. तुम तो खुद में,
    एक लफ्ज़ हो,
    इबारत हो,
    तबस्सुम हो,
    एक मिज़ाज हो | बेहद खूबसूरत भाव ..!

    उत्तर देंहटाएं
  17. जो जीवन में नज्म कविता सी घुली हो उसपर क्या लिखे , फिर भी बहुत लिखा !

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  18. तुम तो खुद में,
    एक लफ्ज़ हो,
    तबस्सुम हो,
    एक मिज़ाज हो |....

    Fantastic !...Great lines !

    Beautiful expression.

    .

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  19. सहियै कहि रहे हैं आप ! जब जीवनै कबिया गया तौ अन्तै कौन कबिता लिखाई भला??

    तुम तो खुद में,
    एक लफ्ज़ हो,
    तबस्सुम हो,
    एक मिज़ाज हो।
    - प्यारी पँक्तियां हैं। सुन्दर जी ! आभार !!

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  20. सच है शब्दों की नज़्म तो कोई लिख भी ले ... जिंदा नज़्म को लिखना आसान नही ....

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  21. जब भी लौटा हूँ,
    पास से तेरे,
    कभी नज़्म,
    तो,
    कभी ग़ज़ल,
    ही,
    छपी मिली है,
    दिल पे मेरे |
    तुम पे,
    क्या लिखूं,
    और कैसे लिखूं ?

    वाह... अमित जी ,बहुत खूबसूरती से अपने दिल की कोमल भावनाओं को शब्द दिए हैं... दिल को छू गयी आपकी नज़्म....

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  22. बहुत प्यारी अभिव्यक्ति ....
    शुभकामनायें !!

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  23. जब भी पास से लौटा हूँ तेरे ,
    तो कभी नज्म ,कभी ,ग़ज़ल ही ,छपी मिली है ।
    खूबसूरत हैं अंदाज़ आपके ।
    अलफ़ाज़ आपके ,तारीफ़ करूँ आपकी तो कैसे करूँ ,
    खुद ही बताएं तसव्वुरात आपके !

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  24. bahut khub Amit ji...shabdon mein wo samarthya kahan ki prem ki bhawna ko samet sakein aur chtrit kar sake...achha laga padh kar...samay mile to www.niharkhan.blogspot.com,www.boltitasveerein.blogspot.com,www.vijuyronjan.blogspot.com par aaiye...

    उत्तर देंहटाएं
  25. जब भी लौटा हूँ,
    पास से तेरे,
    कभी नज़्म,
    तो,
    कभी ग़ज़ल,
    ही,
    छपी मिली है,
    दिल पे मेरे |....

    बहुत खूब! बहुत कोमल अहसास..बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना..

    उत्तर देंहटाएं
  26. जब भी लौटा हूँ,
    पास से तेरे,
    कभी नज़्म,
    तो,
    कभी ग़ज़ल,
    ही,
    छपी मिली है,
    दिल पे मेरे |
    तुम पे,
    क्या लिखूं,
    और कैसे लिखूं ?

    Read it twice and found the above lines a lot more appealing than before.

    Very romantic.

    .

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  27. Very beautiful. Love makes this world even more beautiful and the heart happy. What comes out through pen is yet more soulful and true. This is what I see in your poem.
    You are a beautiful poet. I will be here, reading your poetry often.

    -Shaifali

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  28. सच है ..... ये भी लेखन से जुड़ी जद्दोज़हद है...

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