रविवार, 21 सितंबर 2014

"बैक डेट से मोहब्बत ,क्यों नहीं ...."


                                                                             
                                                                             यदि प्रेम एक संख्या है
                                                                             तो निश्चित ही
                                                                             विषम संख्या होगी

                                                                             इसे बांटा नहीं जा सकता कभी
                                                                             दो बराबर हिस्सों में ।

हाँ ,वह एक नेक और पाक रूह थी | अंगूरी बादल सी धुँधलाई उसकी कहानी ने जबसे अपनी चुप्पी तोड़ी है , कसम से उसकी उदासियाँ अब सालने लगी हैं | स्मृति जब रीतती है तब पनीली उदासी भी रिसते रिसते एक सवाल छोड़ जाती है ,क्या मुझे तब भी मोहब्बत थी उससे |

स्वेटर बुनते हुये जब वह निगाहें उपर उठाकर भौं के बीच एक मुस्कुराता हुआ प्रश्नचिन्ह बनाती थी न ,तब मेरे सारे दुखों के बीज जन्मने से पहले ही मृतप्राय हो जाया करते थे | उसकी स्मृतियाँ अमलतास की डाली है ,जिस पर सदियों से विरासत की चली आ रही मोहब्बत की कहानियों के शब्द बनते बिगड़े मेरी नज़्म का ही रूप अख्तियार कर लेते हैं और गाहे बगाहे मुझे ही उसके राग विराग से रु-ब-रू भी कराते हैं और हैडल विद  केयर की नसीहत भी देते हैं |

अब एहसास होता है कि वह मैं ही हुआ करता था दुआ में उसकी ,जो मेरी नज़्म और मेरे कमरे का मौसम ख़ुशबुओं से लबरेज़ कर उठती थी । अक्सर वह प्रेम में होने का अर्थ और प्रेम का रसायन् बयाँ करती नहीं थकती थी | दुआ एक और की थी उसने जब स्पर्श किया था होंठ मेरे और बरबस ही निगाह में रिश्ते कुछ बन से गए थे | इच्छायें मुझे एहसास कराती तो रहीं उसकी चाहत की ,परंतु जैसे बादल धूप न बनने दे तो सर्दी कभी गुनगुनी नहीं लगती बस वैसे ही वक्त ने एक पुल न बनने दिया हमारे और उसके बीच जो उसके साया को मिला देता रूह से मेरी |

बदरा भी इंतज़ार करता है बरसने से पहले कि कोई ख्वाहिश तो करे बारिश की ,बस उसी तरह मैं भी इंतज़ार करता रहा  उम्र भर प्रेम करने से पहले प्रेम का विज्ञान समझ पाने का  | पर बदरा तो बरस गया ,मैं ही न बरस पाया ।

सच तो यह है कि बिन्दी उसके माथे की शून्य सा लगाती थी , जिसमें विलय होता रहा मैं तब और अब विलीन हो जाएगी मेरी शेष ज़िंदगी की गुज़र | ख्याल से उसके कभी बे-ख्याल हुआ हूँ ,ऐसा शायद कोई लम्हा नहीं पर हाँ ,प्रेम का गणित , प्रेम का भौतिक शास्त्र ,प्रेम की प्रकृति समझने में कुछ वक्त तो ज़ाया जरूर किया | बीज जो बो उठा था हमारे मन में उसके प्रेम का ,उसकी तलाश में अंधेरा सा हो चला है अब मेरी ज़िंदगी में । बस धड़कन जरूर धड़क रही हैं इन दिनों और शायद इनकी तो यही नियति है मौत तक |

इब्तेदा मोहब्बत की हो , इन्तेहा मोहब्बत की हो या हो फिर बेइंतहा मोहब्बत ,हर कहानी में मोहब्बत अब भी रोती है क्योंकि लौ जो जलाता है मोहब्बत की अँधेरी सुरंग में ,वही जल उठता उस लौ में ,जैसे रेत में मरता हो कोई बस गुजारिश करता हुआ ,दो बूँद पानी के लिए ।

यकीन हो चला है कि ख्वाहिश कभी पूरी न होने के कारण ही मोहब्बत करने वाले सपनो का सौदागर बनते बनते जोग में रम जाते हैं | यूं तो सिन्दूर हर औरत की आकांक्षा होती है जो उसे नदी सा प्रवाह और पवित्रता देता है । परंतु कुछ लोग उन पर गुलामी की बेड़ियाँ भी जकड़ देते हैं नाकाम इश्क की आड़ में | अच्छा हुआ वह चिड़िया बन उड़ गईं और मेरी प्रतीक्षा नहीं करी ,क्योंकि मैं तो यादों के पदचिह्न पर चलता चला ही जाऊँगा |

आज वह रास्ते याद आ गये जिन पर हम चले थे कभी संग संग ,खाते खाते कच्ची मूंगफलियाँ और एक बार इन्ही रास्तों पर सहसा एक झटके में मैने उसके  चेहरे को उसकी ही ज़ुल्फ़ों से बेनकाब करते हुये उसका मुंह चूम लिया था | तब उसने कहा था ,आसमां की ओर ताकते हुए ,सुनो बरखा ,बरस न जाओ एक बार फिर , जिससे मैं उसके आंसू न देख सकूं | उसने ढांप लिया था चेहरा अपनी हथेलियों से ।

आज अकेले सोचता हूँ तो लगता है जब वह थी तब जैसे तारों की बारात थी मेरे पास और आज तारों की घर वापसी हो गई और कर गई मुझे अजनबी मेरे ही घर में और अब घर का हर कोना डेड एंड सा लगता है | मृत्यु कहूँ या महामुक्ति अब तो बस उसी की प्रतीक्षा में एक ख्वाब जलता हुआ सा देखता रहता हूँ |

जब कभी ख्वाब का रूपांतरण उसके  चेहरे में हो जाता है तब उसकी पनीली आंखे चुभन सी पैदा करती हैं मेरे जिस्म में और अनायास होने लगती है एक तलाश कविता की | पर जब एक ख्वाब थका सा हो तो उसमे और चिता में कोई फर्क नहीं होता क्योंकि फिर दोनों ही दोनो भस्म कर डालते हैं ख्वाबों के वजूद को |

तुम्हारे बिना रिहाई आसान नहीं इस तन्हाई की कैद से | बंधक बन बैठा हूँ तुम्हारी यादों का , जो शायद जीवन यात्रा की समाप्ति पर ही अब रिहा करेगा मुझको | अब जब भी प्रेम कविता लिखता हूँ न ,वो लम्हे जिनमे उसकी याद गुजरी , डुबो ही लेते हैं मुझे अक्सर झील बन कर |

सोचता हूँ मैं ही न समझ पाया उसको  ,कितना मोहब्बत करती थी वो मुझसे | मुझे तो अब उस से मोहब्बत हो गई है 'बैक डेट' से |

"इश्क तुम्हे हो जायेगा" अनुलता जी का एक अद्भुत संकलन हैं 'प्रेम कविताओं' का । इस धरोहर का प्रत्येक शीर्षक एक पोटली है जिसमे बंद है अनमोल खजाना । बस उन्ही पोटलियों को इकठ्ठा कर एक प्रयास किया है ,एक टूटी फूटी कहानी लिखने का । (इस कहानी को अर्थ देने के लिए अनु जी की पुस्तक के सभी शीर्षकों को ही शब्द-विन्यास के रूप में प्रयुक्त किया गया है ) 

6 टिप्‍पणियां:

  1. अमित जी....आपका जवाब नहीं !! ऐसा लगा जैसे मेरी कवितायें आपकी कहानी का पात्र बन कर जी उठीं हैं ...अमर हो गयी हैं !!
    अब मेरी अगली किताब कहानियों की होगी....और आप उस पर कविता लिखेंगे ये वादा कीजिये :-)

    thanks a lot !!
    अनु

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    1. पहले तो आपकी टिप्पणी के लिए बहुत बहुत आभार और हाँ ,वादा रहा कि कोशिश अवश्य करूंगा ।

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  2. सुंदर..अनुजी की कृति बहुत रंग बिखेर रही है।।

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