बुधवार, 17 सितंबर 2014

"कान उमेठने के लिए नहीं बने हैं ......."


जरा सी गलती पर किसी भी बच्चे के कान उमेठ देना अत्यंत साधारण सा सत्य है । ईश्वर ने कभी स्वप्न में भी न सोचा रहा होगा कि उसकी रचना का लोग इस तरह दुरुपयोग करेंगे । कान उमेठना दंड का एक प्रकार शायद इस लिए बन गया होगा क्योंकि कान उमेठने में जिसका कान होता है उसे दर्द होता है और कान उमेठने वाला उमेठने के प्रकार से दिए जाने वाले दर्द को नियंत्रित कर सकता है । इसीलिए विभिन्न प्रकार की गलती के लिए विभिन्न आयु के बच्चों के लिए विभिन्न तरीके हैं कान उमेठे जाने के ।

यूं ही विचार विमर्श से ज्ञात हुआ कि अगर बच्चा गलती करके सर झुकाये नीचे देख रहा है तब उसके कान 'क्लॉक वाइज़' उमेठने से उसका चेहरा ऊपर की ओर अपने आप उठ जाता है और अगर गलती करने के बाद भी ऊपर ही घूर रहा है तो कान 'एंटी-क्लॉक वाइज़' उमेठने से उसका चेहरा अपने आप नीचे हो जाता है | एक केमिस्ट्री के मास्साब ने बताया कि अगर कान उमेठने से आंसू भी निकल आएं तो यह रासायनिक परिवर्तन है और अगर केवल मुंह बन जाये और आंसू न निकले तो यह भौतिक परिवर्तन है ,क्योंकि कान तो छोड़े जाने के बाद पुनः अपने मूल रूप में आ जाता है । यह तो हास परिहास की बात हुई ।

कान उमेठने का उद्देश्य अगर बच्चे को गलती का एहसास कराना है तो यह कार्य बगैर कान उमेठे भी किया जा सकता है । किसी भी आयु के बच्चे को पीड़ा पहुँचाते हुए सुधार करने की अपेक्षा पूर्णतया गलत है । इस प्रकार की प्रक्रिया से बच्चों को दर्द तो अधिक नहीं होता है पर वे अपमानित हो कुंठा से भर जाते है । ऐसी कुंठाएं आगे चल कर उन्हें बुरी संगत और प्रतिशोधात्मक काम करने को अग्रसित करती हैं ।  ऐसी कोई स्थिति नहीं होती जिसमे कोई भी अपने बच्चे से सरल तरीके से बात कर उसे समझा न सके । अगर आप ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तब कहीं न कहीं दोष आप में है ।

सीधा सा मूल मन्त्र यह है कि जब आप अपने बच्चे से बात करें तब केवल उससे ही बात करें । मतलब ऐसा न हो कि आप घर का या ऑफिस का काम भी कर रहे हों , टीवी देख रहे हों , मोबाइल पर बात कर रहे हों , मेहमान नवाज़ी कर रहे हों और इन सबके साथ साथ बच्चे को भी नसीहत दे रहे हों  । बच्चे भली भांति समझते हैं कि उनके माँ बाप की वरीयताएं क्या हैं । उन्ही के अनुसार ही वे भी प्रतिक्रिया देते हैं ।

अगर बच्चे बड़े हो कर अच्छे नागरिक बनते हैं और समाज में एक आदर्श स्थापित करते हैं तो आवश्यक नहीं माँ-बाप को श्रेय दिया जाये ,परन्तु अगर बच्चे समाज के लिए अथवा परिवार के लिए समस्या बन जाते हैं तब सारा का सारा दोष माँ बाप का ही माना जाना चाहिए ।

गलती होने पर भी बच्चे को सीने से लगा कर स्नेह से समझा कर देखिये तो सही । वह अपने उसी 'कान' से आपके दिल की धड़कन सुन कर सब समझ जाएगा जिस 'कान' को आप उमेठने को बेताब रहते हैं । 

13 टिप्‍पणियां:

  1. इतने नाज़ुक विषय को बड़े ही सधे हुए ढंग से आपने टैकल किया है ....व्यक्तिगत तौर पे मैं बच्चों को मारने पीटने या किसी भी किस्म की यातना पहुँचाने के पक्ष में बिलकुल नहीं हूँ ...यह केवल बर्बरता है ..अपनी पोजीशन का नाजायज़ फायदा उठाना है..बच्चा बेचारा आप पर आश्रित है तो आप जैसे चाहें वैसा व्यवहार कर सकते हैं क्या उसके साथ ....? यही बच्चा जो आज मजबूर है ...इस बात को भूलेगा नहीं और कल इससे दुगुने ज़ोर से ...अपने तरीके से वही कृत्य दोहराएगा ....तो उसमें उसकी क्या गलती होगी .....इसलिए माता पिता को भी समझना चाहिए कि छोटे बच्चों को प्यार से और बड़ों के मित्र बनकर ही उन्हें सही राह पर लाया जा सकता है .

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  2. you can be a very successful counselor !

    you have superb convincing power !

    bahut badhiya post !
    anu

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  3. कान उमेठने से बच्चे जिद्दी हो जाते हैं...
    अपमान का बोध उनका विकास अवरुद्ध कर देता है...
    सही मनोवैज्ञानिक पोस्ट |

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  4. एकदम सच्ची बात ... बच्चे ही क्या कोई भी हो , मार पीट या शारीरिक पीड़ा पहुँचाना किसी भी समस्या का हल नहीं हो सकता. बल्कि इसके ज्यादा प्रयोग से वह जिद्दी और विद्रोही हो सकता है. अपनत्व और प्रेम से किसी को भी बेहतर ढंग से समझाया जा सकता है और फिर बच्चे तो कच्ची मिट्टी से होते हैं जरा सा सराहिये थोड़ा सहारा दीजिए बस ... ढल जायेंगे जैसे आप चाहेंगे.

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  5. कान उमेठना मानवीय गरिमा के खिलाफ है।
    एक सुनी-सुनाई बात बताना चाहुंगी- वैदिक काल की आश्रम पद्धति के द्वारा दी जाने वाली शिक्षा के दौरान विद्यार्थियों के पठन-पाठन में किये गए त्रुटियों पर दंड स्वरूप गुरु कान उमेठा करते थे। जिसका उदेश्य विद्यार्थी के दिमाग को और विकसित करना था। कान उमेठने की भी एक कला होती थी जिसका संबंध दिमाग से होता था। लेकिन अब तो उस कला का कोई ज्ञान भी नही रखता । बस हर छोटी-बड़ी गलतियों पर बच्चों का कान उमेठ देना अभिभावकों की प्रवृति बनती जा रही है। जो बच्चों में कुंठा, द्वेष ,विद्रोह की भावना को जन्म दे रहा है। यह पूरे समाज के लिए भी बहुत घातक है।

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  6. बहुत अच्छा लेख. वैसे बच्चों को अनुशासित करने के लिए स्वयं को पहले अनुशासित करना पड़ता है जो कठिन है सो मार पीट की सरल राह पकड़ी जाती है.
    घुघूती बासूती

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  7. शारीरिक प्रताड़ना देकर सिखाने की कोशिश शिक्षक की अक्षमता का परिचायक है। कान खींचने से दिमाग तेज होने की बात पूर्णतः अवैज्ञानिक और दुष्टतापूर्ण है।

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  8. कल 19/सितंबर/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  9. अब तो हम लोग इतने बड़े हो गए हैं कि अपने बच्चों को टोक सकते हैं ,जब वे अपने बच्चे के कान उमेठने को बढ़ें तो उनसे कहें,'पहले अपनी आदतें तो सुधारों !'

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  10. मैंने पहले भी एक ऐसी ही पोस्ट पढ़ी थी जिसमे लिखा था कि कान मरोड़ने से दिमाग शार्प होता है ...लेखक ने अपने कई कारण भी बताये थे।

    खैर....
    बच्चों को स्नेह की जरूरत होती है न की किसी शारीरिक दंड की। बच्चे किसी भी बात को दिलो-दिमाग पर ले सकते है।

    खुबसुरत पोस्ट।
     पासबां-ए-जिन्दगी: हिन्दी

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