रविवार, 7 सितंबर 2014

" एक शौक ..बात करने का ..अनजान लोगों से ..."


कभी यूँ ही ज़िक्र कर बैठा था कि अगर कभी रास्ते में कोई गलत तरीके से कार चलाते हुए मिल जाता है तब उससे रोक कर पूछ ही लेता हूँ ,इतनी भी क्या जल्दी या इतना कन्फ्यूज़न क्यों । इस पर एक टिप्पणी मिली कि बहुत फुर्सत रहती है आपको रास्ते में भी । मैंने कहा ,क्या करें अनजान लोगों से बात करने का शौक जो है ।

अचानक मुझे लगा कि यह तो सच बात है । जब किसी परिचित से मिलता हूँ तो उसके बारे में चूंकि पहले से ज्ञात होता है ,अतः उसी अंदाज़ और दायरे में उससे बात होती है । परन्तु अनजान व्यक्ति ,जिससे आप कभी पहले न मिले हो ,उससे अकस्मात बात करने में बहुत आनंद एवं रोमांच होता है । एक कारण मेरे साथ यह भी हो सकता है कि चूंकि आरम्भ से ही नौकरी की प्रकृति के कारण हमेशा नए नए लोगो से ही मिलना होता रहा एवं जो भी मिला पहले अत्यंत रोष और बिगड़े अंदाज़ में ही मिला । मैं तो बड़े मजे से ऐसे लोगों की सुनता हूँ , फिर जब उनके काम हो जाते हैं तो उनके रोष रहित चेहरे और भी अच्छे लगते हैं ।

अब अचानक रास्ते में कोई कार वाला बाई ओर का इंडिकेटर देकर दायें मुड़ता मिल जाए तो उसे रोक कर पूछ ही लेता हूँ ,घर पर सब ठीक तो है । पहले तो वह मुझे घूरता  / घूरती  है ,फिर अपनी गलती देख एक मुस्कान बिखेर कर आगे बढ़ जाता / जाती है । अनजान लोगों से विवाद की स्थिति होने पर मुझे तो बहुत ही मजा आता है । पहले उन्हें समझने की कोशिश करता हूँ ,फिर समझाने की ,तब भी न माने तो चुपचाप अलग हो जाता हूँ पर शांत रह कर पूरा आनंद ले लेता हूँ । निवेदिता भी अक्सर कहती है ,"आप मुझसे लड़ते नहीं बल्कि अपना मूड ठीक करने के लिए मुझे लड़ने के लिए उकसाते हैं । "

इस बात पर भी मुझे कई बार टोका गया है घर पर, कि फोन पर किसी नए व्यक्ति से आप इतने अच्छे से बात करते हैं कि आपसे तो फोन पर ही किसी अनजान नंबर से बात करनी चाहिए । मैं कहता हूँ कि अनजान के साथ अप्रत्याशा जो बनी रहती है ।

अनजान लोगों से किसी भी विषय / संदर्भ में कई बार नई बातें पता चल जाती हैं ,जो कोई आपको जानने वाला इसलिए नहीं देता कि पता नहीं आपको अच्छा लगे या नहीं । जैसे अक्सर सफर में या पब्लिक प्लेस में जहाँ लोग मुझे नहीं पहचानते ,बिजली से सम्बंधित या बिजली चोरी के तरीके पर महत्वपूर्ण जानकारी दे डालते हैं । जब उन्हें मेरे बारे में पता चलता है तो फिर अपना नाम छिपाने लगते हैं ।

अनजान लोगों से बात करना और अबोध बच्चों से बात करना एक सामान होता है । जो कोई आपको जानता नहीं होगा वही आपसे सारी बातें सच्ची सच्ची बता देगा । 

मेरी इस फितरत पर एक टिप्पणी यह भी मिली  ,"हम भी अनजान होते तो हमारी बारी भी आ जाती ।" अनजान था तभी तो आपको इतना जाना ,जानता होता ,पहले से, तो इतनी जान पहचान न होती ।

वैसे मैं संबंधों में विषमताओं का सम्मान करता हूँ शायद इसीलिए मेरे मित्रों में भी आपस में बहुत भिन्नता है । 

19 टिप्‍पणियां:

  1. सच में अनजान लोगों से बात करना बेहद ही सहज होता है ये मेरा भी अनुभव है

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  2. वाकई.....कभी सोचा नहीं इस बारे में...
    एक कहानी का प्लाट मिल गया :-) चुराने की इजाज़त दीजिये :-)

    अनु

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  3. बात शुरु करते ही लोग अनजान कहां रहते हैं! बतियाने का शौक तो अनादि काल से चला रहा है। बतियाने के लिये लोग क्या-क्या जतन नहीं करते थे:-

    बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय
    सौंह करे,भौंहन हंसे , देन कहे नटि जाय।

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  4. मुझे भी किसी अनजान से बात करने और उसकी बात सुनने में सीरियल देखने जैसा आनन्द मिलता है !

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  5. हां....बतियाने के शौक ने ही तो अब लोगों की मित्र-सूचियां इतनी लम्बी कर दीं :) ये अलग बात है कि जनबियों से मेरी बात करने की इच्छा बहुत कम होती है. अजनबी, यानि जिसका नाम तक न जानते हों, जो ट्रेन व्रेन में मिला हो. काम भर की बात तक तो ठीक है, लेकिन अगर कोई ज्यादा ही बतियाने लगे तो मुझे उलझन होती है. जबकि जिससे दोस्ती पुरानी हो, उससे बतियाने की इच्छा भ हमेशा ज़िन्दा रहती है मेरी :) उलट हूं मै तो :)

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  6. एकदम मुन्ना भाई एम् बी बी एस टाइप का नजरिया है. मस्त है.
    अपना तो मूड पर डिपेंड होता है... :)

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  7. ये तो अपना भी नजरिया है और कितनी बार ऐसी चीजें और बातें सामने आ जाती हैं जिनके बारे में हम सोच भी नहीं सकते हैं। अनजान इंसान अपने दिल के गुबार सिर्फ इस लिए निकल देता है की ये कोई शिकायत है उससे कहने थोड़े ही जा रहा है और मन का गुबार निकल गया तो वह हल्का हो गया। ट्रेन , स्टेशन , बस आदि में ऐसे कई लोग मिले हैं।

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  8. निवेदिता भी अक्सर कहती है ,"आप मुझसे लड़ते नहीं बल्कि अपना मूड ठीक करने के लिए मुझे लड़ने के लिए उकसाते हैं । " और " वैसे मैं संबंधों में विषमताओं का सम्मान करता हूँ शायद इसीलिए मेरे मित्रों में भी आपस में बहुत भिन्नता है " इन दो बातों ने प्रभावित किया तो टिप्पणी देने का मोह रोक न पाई ...असल में पूरी पोस्ट ही दिलचस्प लगी जिसे ध्यान में रखते हुए कई किस्से लिखे जा सकते हैं :)

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  9. इसी आदत के चलते कई दोस्त बन गए हैं और अब अनजान नहीं रहे .... फ़िर सफ़र तो जारी हीहै

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  10. Wow..I do the same...Many times, when alone, starts travelling to city, exploring people and food...its enriches us.

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  11. ये तो एकदम नयी बात सुनने को मिला भैया...लेकिन एकदम सही कहा आपने !

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  12. फेसबुक से इतर ,यहाँ एक सीरियस टिपण्णी .मशहूर लेखिका शिवानी एक बार लन्दन से वापस लौट रही थीं तो उन्हें एक पाकिस्तानी सहयात्री मिल गयीं. दोनों के बीच बातों का सिलसिला चल निकला. कुछ ही देर में उनकी बीच पक्की सहेलियों सी बातें होने लगीं. शिवानी ने एक बहुत ख़ूबसूरत बात कही थी कि "ये पिछले जनम के रिश्ते होते हैं जो इस जनम में भी जरा सा अनुकूल वातावरण मिलते ही पल्लवित पुष्पित हो उठते हैं ."

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  13. अनजान लोगों और अबोध बच्चे से बात करना एक समान होता है |लेकिन कभी कभी वो बच्चा शैतान भी होता है और शरारती भी ..मेरी तरह ;)..तो अगर ऐसे अनजान लोगों से बच कर रहिएगा

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  14. वाकई ये शायद हम सबके साथ होता है पर कभी इतनी गहराई से नहीं सोचा , जितना बख़ूबी सोच कर आपने इसे कलमबद्ध कर दिया । बहुत ख़ूब ।

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