सोमवार, 16 सितंबर 2013

" सरकारी केचुए ........"


आज क्यारी में यूँ ही खुरपी लेकर कुछ घास निकाल रहा था । अचानक से एक केचुआ वही दिख गया । बहुत देर तक उसे और उसकी क्रियाओं को गौर से देखने के बाद सहसा मुझे आभास हुआ कि वह केचुआ तो एक सरकारी अफसर की भाँति काम कर रहा था ।

वह केचुआ बड़ी तन्मयता से धीरे धीरे अपने काम में लगा था । उसकी गति को देख कर उस पर तरस भी आ रहा था और क्रोध भी । ईश्वर ने भला उसे गति क्यों नहीं दी । इतने ज़रा से काम को करने में इतना समय लेने का क्या औचित्य ! काम करते करते अचानक वह कुंडली मार कर रुक गया तो मैंने उसे हाथ से सीधा किया । वह फिर धीरे धीरे रेंगने लगा । मेरे अनुसार वह गलत दिशा में जा रहा था ,अतः मैंने उसके एक सिरे पर हाथ लगाया तो वह वहां से पीछे की ओर रेंगने लगा । पकड़ने की कोशिश की तो इतना चिकना था कि हाथ से फिसल गया । वह बस एक ही काम में लगा था ,मिटटी को ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर किये जा रहा था । अनवरत बस यही काम और कुछ नहीं । बहुत प्रयासों के बाद भी मै यह नहीं पहचान पाया कि उसका मुंह किधर है और पूंछ किधर । लगता था जैसे वह मिटटी ही खाता है और मिटटी ही का उत्सर्जन भी करता है । कभी कभी ऐसा भी लगा भी कि वह आगे बढ़ने का प्रयास तो बहुत कर रहा है ,उसके बदन में हरकत तो बहुत हो रही है पर अपनी जगह से ज़रा भी टस से मस नहीं हो रहा है ।  

मैंने उसे पलट कर देखने की कोशिश की तो भी समझ नहीं आया कि उसका पेट किस ओर है और पीठ किस ओर । उँगलियों से उसे ज़रा सा धक्का दिया तो दूर जा गिरा परन्तु बिना कुछ बोले ,बिना कोई क्रोध दिखाए फिर अपने काम में लग गया उसी मंथर गति से । उसे कितना भी परेशान किया तब भी उसने न काटा ,न भौंका और न ही पलट कर देखा ,बस करता रहा धीरे धीरे मिटटी की उलट पलट ।

कहते हैं इसी उलट पलट से वह केचुआ खेत को उर्वर बनाता है और उससे पैदावार बढ़ जाती है । 

बस ऐसे ही होते हैं सरकारी अफसर । न पेट का पता ,न पीठ का । अति व्यस्त दिखना इनका शगल ,दिन भरे चलते अढाई कोस और फाइलों को ऊपर नीचे कर अपने दफ्तर को उर्वर बनाते रहते हैं

कहते हैं केचुओं को अगर बंजर जमीन में डाल दिया जाये तो वे वहां भी उलट पलट कर उस जमीन  को उर्वर बना कर उसमें भी कुछ न कुछ पैदा करा ही देते हैं । ऐसे ही कुछ अफसर भी अपनी इस 'केचुआ टाइप' कार्यशैली में  इतने सिद्ध हस्त होते हैं कि उन्हें कहीं भी किसी भी जगह तैनात कर दिया जाये ,तब भी वे वहां फाइलों को इतना ऊपर नीचे कर डालते हैं कि वह दफ्तर जो पहले कभी घोर बंजर रहा हो ,वह भी उर्वर हो जाता है और उस दफ्तर में भी जबरदस्त पैदावार होने लगती है । ऐसे अफसर बहुत तेज़ तर्रार और गट्स वाले कहलाते हैं ।

परन्तु मुझे तो ये अफसर सरकारी केचुए नज़र आते हैं । 

11 टिप्‍पणियां:

  1. हा हा हा हा, भूमि उर्वरक बनाने का श्रेय तो दे दें उन्हें।

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  2. गजब की तुलना की है.. तुलना क्या पढ़ने के बाद बिल्कुल समकक्ष ही नजर आता है ।

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  3. आपमें तो हम सबको केंचुआ बना दिया... कभी सपने भी नहीं सोचा था...

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  4. चलो कुछ तो उपयोगिता है:).
    बढ़िया तुलना की है.

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  5. केंचुए, समाज पर भी फिट होते हैं.

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  6. आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल {बृहस्पतिवार} 19/09/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" पर.
    आप भी पधारें, सादर ....राजीव कुमार झा

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  7. केचुवे में विशेष गुण एक ओर भी है।
    यह सांप की भांति केंचुकी मार कर
    नहीं बैठता। हरदम क्रियाशील रहता है।

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  8. केचुवे में विशेष गुण एक ओर भी है।
    यह सांप की भांति केंचुकी मार कर
    नहीं बैठता। हरदम क्रियाशील रहता है।

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