शनिवार, 14 सितंबर 2013

" रेयरेस्ट ऑफ द रेयर.........."


तलब लगी ,
जब कभी उनकी ,
भर जी निहारा किये ,

अफ़सोस ,
इल्म न करा पाए ,
मोहब्बत का अपनी,

पर एहसास ,
तो एहसास है ,
एक दिन होना ही था ,

अचानक उस शाम यूँ ही ,
अक्स सा उभरा उनका ,
खिड़की पर जब ,

लगा सरेशाम ,
चाँद सा ,
उग आया हो कोई  ,

काली जुल्फें ,
संवारती थी  ,
गोरी खनकती कलाईयाँ

नज़रें मिली  ,
जब उनकी ,
कंघी की ओट से ,

लगा कंघी में ,
अरझे हों जैसे ,
जुगनू कई , 

होंठों में बुदबुदाया मै ,
'रेयरेस्ट ऑफ द रेयर' 
वाकया है यह तो ,

फिर तो 'मृत्यु दंड' 
तुम्हारी निगाहों के लिए ,
आवाज़ उधर से आई  ,

और वो खिड़की ,
बंद हो गई ,
सदा के लिए '

शायद वह भी थे सजा-याफ्ता  'उम्रकैद' की । 


11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर बेहतरीन प्रस्तुती,धन्यबाद।

    उत्तर देंहटाएं
  2. कल 15/09/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  3. फिर तो 'मृत्यु दंड'
    तुम्हारी निगाहों के लिए ,
    आवाज़ उधर से आई
    और वो खिड़की ,
    बंद हो गई ,
    सदा के लिए '

    बहुत सुन्दर.

    उत्तर देंहटाएं
  4. खूब .... उस मन की पीड़ा की अभियक्ति यूँ भी ....

    उत्तर देंहटाएं
  5. अफ़सोस ,
    इल्म न करा पाए ,
    मोहब्बत का अपनी,

    सुंदर सृजन ! बेहतरीन रचना !!

    RECENT POST : बिखरे स्वर.

    उत्तर देंहटाएं