बुधवार, 9 जनवरी 2013

"एक मुलाक़ात ....ठण्ड में उनसे ........"


हथेलियाँ उनकी ,
दस्तानों सी थी ,
हाथ जो रखे ,
गरम हो गए ।
गुनगुनी सी ,
निगाहें उनकी ,
नरम धूप सी ,
कुछ यूं थी,
पड़ी जब भी .
मुझ पर ,
ख़याल उन्ही के ,
और सुर्ख हो गए ।
वो बोल तो रहे थे ,
न जाने क्या क्या ,
हम तो गुम थे ,
भाप के बादलों में,
जो उठ रहे थे ,
लबों से उनके।

16 टिप्‍पणियां:

  1. कविता अच्छी है लेकिन ये बताओ कि ये सब कब हुआ? कहां हुआ? ’उनकी’ कौंन हैं?

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  2. :-) ऐसे ही कोमल ख़यालों की गर्मी बने रहे...
    ~सादर!!!

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  3. बड़े खूबसूरत से ख्याल हैं... सर्दी में नर्म कुनकुनी धूप जैसे ... शुभकामनायें

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  4. अहसासों की लाज़वाब अभिव्यक्ति...

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  5. निवेदिता की याद आ रही है......

    सादर
    अनु

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  6. बहुत सुन्दर कविता....
    कोमल भावों की अभिव्यक्ति....

    अनु

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  7. वाह अमित जी बहुत बढ़िया गुनगुनी सी ही रूमानियत नजर आई आपकी इस रचना में :-)

    मेरी नई रचना "khyal" पर भी अपना ख्याल दीजियेगा :-) लिंक दे रही हु
    http://parulpankhuri.blogspot.in/2013/02/blog-post_4266.html

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