बुधवार, 28 सितंबर 2011

"न जी भर के देखा ,न कुछ बात की ; बड़ी आरज़ू थी मुलाकात की"


हर बात पे महके हुए जज़बात की खुशबू,
याद आई बहुत, पहली मुलाक़ात की खुशबू,

होठों में अभी फूल की, पत्ती की महक है, 
साँसों में बसी है उनसे मुलाक़ात की खुशबू,

आंखें कहना चाहती थीं वो तमाम बातें,
पर लब थे कि उलझे रहे निगाहों में उनकीं,

दिल था कि तजबीजता रहा ख़्वाब की हकीकत,
और ख़्वाब थे कि बेताब, होने को हकीकत,

वक्त था कि कुछ ठहरा ही नहीं उधर ,
बिखर गई कुछ बातें खुशबू सी मगर,

यादों के सहारे पहले भी जिए थे,
फिर संजों लायें हैं यादें ही उनकीं |

उन्हें तो पढ़ना भी आसान न था ,
उनपे अब लिखना भी मुश्किल हुआ है ,

इबारत सी बन गई वो ज़िन्दगी की मेरी,
इबादत ही हो गई अब ज़िन्दगी की मेरी | 

13 टिप्‍पणियां:

  1. इबारत सी बन गई वो ज़िन्दगी की मेरी,
    इबादत ही हो गई ज़िन्दगी की मेरी | प्रेम से सरोबर अभिवयक्ति......

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  2. प्यार जब इबादत बन जाए तो एक-दुसरे में ईश्वर के दर्शन होने लगते हैं।

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  3. बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको
    और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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