रविवार, 18 सितंबर 2011

"भूकंप मन का "


व्यक्ति प्रकृति की ही एक प्रतिकृति है | प्रकृति के ही समस्त गुण धर्म व्यक्ति में भी समाहित रहते हैं | किसी
भी व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन काल में उसके मन के भीतर समय की सतहों का एक पहाड़ सा निर्मित होता रहता है | अनुकूल घटनाएं ठोस धरातल का  निर्माण करती है, समय की सतह का, और प्रतिकूल अथवा दुखपूर्ण घटनाएं, सदैव चूँकि भावनाओं से परिपूर्ण होती हैं ,अतः इनसे निर्मित समय की सतह आंशिक रूप से तरल सी होती हैं | होने वाली घटनाओं के क्रम में ही समय की परत एक दूसरे के ऊपर स्थापित होती चली जाती हैं |

अब यदि तरल सतह के ऊपर ठोस सतह की बारी आती है तो स्वाभाविक ही है कि ठोस सतह संभवतः स्थिर
ना रह सके | ऐसी ही स्थिति में व्यक्ति का मन विचलित हो उठता है | बहुत काल के पश्चात ,जब अनेक परतें
,समय की, कुछ ठोस, कुछ तरल, कुछ पथरीली, कुछ नरम ,एक दूसरे के ऊपर अच्छी तरह से जम चुकी होती हैं और ऎसी स्थिति में व्यक्ति के जीवन में पुनः कुछ ऐसा घटित हो जाता है, अथवा पुरानी किसी तरल घटना की पुनरावृत्ति हो जाती है ,तब वो परत वहां से खिसकने लगती है और पूरा का पूरा ढांचा ,व्यक्ति के मन के अन्दर का ,ढहने की स्थिति में आ जाता है | इसी को मन का भूकंप कहते हैं | यह भूकंप प्रकृति के भूकंप से अधिक विनाशकारी होता है | अतः मन के भीतर समय की सतहों का विन्यास इस प्रकार का रखना चाहिए कि सारी परतें एक दूसरे से अभिन्न प्रकार से जुडी रहें | अर्थात व्यक्ति सदैव स्वयं को सभी से जुड़ा महसूस करे | तभी उसे किन्ही विपरीत परिस्थितियों में भी ठोस धरातल का सहारा मिल सकता है |

मन का भूकंप रिक्टर स्केल पर  यदि १० का अंक छू ले तभी शायद व्यक्ति अपने जीवन का अंत या आत्महत्या की बात सोचता है और शायद कर भी डालता है |

"अद्भुत तथ्य यह है कि  ,अधिकतर इस भूकंप का एपिसेंटर किसी दूसर के मन के भीतर होता है ,परन्तु घातक वो दूसरों के लिए होता है |"

17 टिप्‍पणियां:

  1. गज़ब/ अद्भुत!!

    अधिकतर इस भूकंप का एपिसेंटर किसी दूसर के मन के भीतर होता है

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  2. अद्भुत वैज्ञानिक व्याख्या, पर एक गहन सच।

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  3. कितने स्पष्ट तरीके से बयान किया है वाह

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  4. एक गहन सच
    स्पष्ट तरीके से बयान किया है

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  5. सभी से जुड़ा महसूस करना...यही तो मूलमंत्र है जिसके कारण मन की सभी परतें मज़बूती से जुड़ी रहती है..ऐसे में मन के भीतर भूकंप आ ही नहीं सकता...हल्की तरंगे उठना स्वाभाविक है जो हमारे वजूद को नया रूप देती हैं..

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  6. अमित जी , मन के भूकंप से हम सब गुजरते है कुछ परिणाम तब विनाशकारी होते है तो कुछ फायदे मंद भी ॥ आपने काफी उच्च स्तर तक सोच कर मन मे होने वाली हलचल को शब्दो मे ढाला है , बधाई ।

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  7. bahut khoob amit ji..bilkul theek kha ki uska kendr to dusre me mann ke bheetr chhipa hai ..farak to dono par padega..

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  8. क्या विश्लेषण किया है अमित जी... बहुत खूब!
    ~सादर!!!

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