मंगलवार, 10 मई 2022

नज़्म का पहरा

 लफ्ज़ लफ्ज़ तेरा बेचैन करता रहा रात भर,

ख़त में लिख दे इन्हें या नज़्म का पहरा कर दे।


तकाज़ा दिल का था फिर इल्जाम जुबां पे क्यों,

मौसम बंजर बहुत इन आँखों को अब झरना कर दे।


दीदारे जुनू न रहा कोई बात नही अब 'अमित',

पलकें मचलती है बस इत्ते इल्म का सौदा कर ले।


दस्तक दें जब कभी सांसें मेरी दिल पे तेरे

लबों से चूम लेना नाम मेरा इत्ता सा वादा कर ले।

7 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार(१३-०५-२०२२ ) को
    'भावनाएं'(चर्चा अंक-४४२९)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १३ मई २०२२ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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