मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

" हैशटैग....."


हैशटैग सा ,
हो गई थी तुम ,
प्रसंग होता मैं ,
सन्दर्भ रहती तुम  ।

सूखे पत्ते हों या,
हो कटी पतंग ,
उन्हें कोई अब
हैशटैग नहीं करता ।

बालकनी पे खुलते ,
खिड़की के वो पल्ले  ,
जैसे हो एक जोड़ी ,
निगाहें तुम्हारी ।

स्मृतियाँ नहीं ,
बनती मञ्जूषा ,
जानता अगर ,
तो क्यों सहेजता ।

7 टिप्‍पणियां:

  1. खूबसूरत रचना
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है

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  2. बहुत ही सुंदर, दिल को छू लेने वाली प्रस्तुति...
    कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारें.... ;) :P

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  3. अब कौन याद करता है सूखे पत्तों को ..कटी पतंग को . उनको तो डायरी में संभाल के रखता था तब ‪#‎टैग‬ का जमाना नहीं था ना ..अब तो हर कोई बस उड़ते रहना चाहता है ..खिलते रहना चाहता है तो #टैग भी modren होंगे ना ।

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  4. अब कौन याद करता है सूखे पत्तों को ..कटी पतंग को . उनको तो डायरी में संभाल के रखता था तब ‪#‎टैग‬ का जमाना नहीं था ना ..अब तो हर कोई बस उड़ते रहना चाहता है ..खिलते रहना चाहता है तो #टैग भी modren होंगे ना ।

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