"शब्द भीतर रहते हैं तो सालते रहते हैं,
मुक्त होते हैं तो साहित्य बनते हैं"। मन की बाते लिखना पुराना स्वेटर उधेड़ना जैसा है,उधेड़ना तो अच्छा भी लगता है और आसान भी, पर उधेड़े हुए मन को दुबारा बुनना बहुत मुश्किल शायद...।
अब कौन याद करता है सूखे पत्तों को ..कटी पतंग को . उनको तो डायरी में संभाल के रखता था तब #टैग का जमाना नहीं था ना ..अब तो हर कोई बस उड़ते रहना चाहता है ..खिलते रहना चाहता है तो #टैग भी modren होंगे ना ।
अब कौन याद करता है सूखे पत्तों को ..कटी पतंग को . उनको तो डायरी में संभाल के रखता था तब #टैग का जमाना नहीं था ना ..अब तो हर कोई बस उड़ते रहना चाहता है ..खिलते रहना चाहता है तो #टैग भी modren होंगे ना ।
अरे वाह... :)
जवाब देंहटाएंखूबसूरत रचना
जवाब देंहटाएंमेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है
खूबसूरत ...
जवाब देंहटाएंसुन्दर प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंबहुत ही सुंदर, दिल को छू लेने वाली प्रस्तुति...
जवाब देंहटाएंकृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारें.... ;) :P
अब कौन याद करता है सूखे पत्तों को ..कटी पतंग को . उनको तो डायरी में संभाल के रखता था तब #टैग का जमाना नहीं था ना ..अब तो हर कोई बस उड़ते रहना चाहता है ..खिलते रहना चाहता है तो #टैग भी modren होंगे ना ।
जवाब देंहटाएंअब कौन याद करता है सूखे पत्तों को ..कटी पतंग को . उनको तो डायरी में संभाल के रखता था तब #टैग का जमाना नहीं था ना ..अब तो हर कोई बस उड़ते रहना चाहता है ..खिलते रहना चाहता है तो #टैग भी modren होंगे ना ।
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