रविवार, 9 जून 2013

"स्कूल कैसा हो ........द्वितीय भाग "



..........कक्षा ६ में आते आते बच्चा समझदार हो जाता है । कक्षा ६ से कक्षा १० तक की पढ़ाई के दौरान ही बच्चे की अभिरुचि विकसित और परिलक्षित होती है । विज्ञान और गणित की कठिन पढ़ाई शनै शनै सामने आने लगती है । ऐसे में स्कूल ऐसा हो जहाँ शिक्षक बच्चे के कोमल मस्तिष्क में उपजे कौतूहल और असमंजस को सरल विधि से शांत कर सकें । अधिकतर बच्चे पढ़ाई में मन लगाते हैं और हमेशा अव्वल भी रहना चाहते हैं परन्तु जैसे ही उनके मन में किसी विषय / प्रश्न को लेकर दुविधा की स्थिति उत्पन्न होती है ,वह तत्काल उसका उत्तर पाना चाहते हैं । ऐसे में अगर स्कूल या घर में उन्हें उसका हल न मिला तब धीरे धीरे उस विषय से वह विमुख होने लगते हैं । बच्चे वही विषय सबसे अधिक पढ़ते हैं जो उन्हें सरलता से समझ में आ जाता है । रूचि बाद में पनपती है ,पहले विषय की सरलता ही उन्हें आकर्षित करती है । 

ऐसे में अगर शिक्षा के इस भाग के लिए स्कूल ऐसा हो तो बेहतर है :

१.शिक्षक बच्चों को किसी भी नए विषय को सरलता से समझाते हुए उसके प्रति रूचि उत्पन करें ।  

२.समय समय पर बच्चो से उनकी रूचि की जानकारी ली जाए और जिस विषय में सबसे कम रूचि हो ,उस विषय के शिक्षक के पढाने के तौर तरीकों की स्कूल प्रशासन द्वारा समीक्षा की जाए । 

३.कक्षा ८ से कक्षा १० तक के विषयों की अत्यंत गंभीरता से और समग्रता में पढ़ाई कराई जानी चाहिए । अंक प्राप्त कर लेने के उद्देश्य से पढ़ाई कभी नहीं कराई जानी चाहिए । 

४ . स्कूल चुनते समय उस स्कूल से पढ़ कर निकले हुए बच्चों के बारे में पता कर लें कि उन्होंने आगे क्या हासिल किया । अनेक स्कूल अपने यहाँ से पढ़े हुए बच्चों के रिज़ल्ट डिस्प्ले कर देते हैं ,जिसमे हर बच्चा ९५ प्रतिशत से अधिक अंक पाया हुआ होता है । ऐसे परिणाम एकदम व्यर्थ हैं अगर वह बच्चा किसी प्रतियोगी परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो पाता । 

५.जिन स्कूलों में होम वर्क बहुत अधिक मिलता है ,उन बच्चों के माँ बाप यह समझ कर बहुत प्रसन्न होते हैं कि उस स्कूल में बहुत अच्छी पढ़ाई होती है । जबकि होता बिलकुल इसके विपरीत है । कक्षा ८ तक तो होम वर्क अत्यंत न्यूनतम होना चाहिए । पढ़ाई का ढंग स्कूल में ही ऐसा हो कि बच्चे को सब समझ आ जाए और सारे अभ्यास कक्षा में ही पूरे हो जाएँ । 

६.बच्चों को पढ़ाने के दौरान मैंने अक्सर एक प्रयोग यह किया था कि मैं उनसे किसी भी विषय को पढ़ाने के बाद उनसे उस पाठ के बारे में प्रश्नपत्र बनाने को कहता था और चैलेन्ज यह होता था कि ऐसा प्रश्न पूछना कि जिसका उत्तर मैं भी न दे पाऊं । इस चैलेन्ज के चक्कर में वह अत्यंत बारीकी से पाठ पढ़ते थे और वो अपने प्रश्नों से प्रायः चैलेन्ज जीत लिया करते थे और आनंद तो सर्वाधिक तब होता था जब उनकी कल्पना के ही प्रश्न परीक्षा में आ जाते थे । स्कूलों में भी ऐसे प्रयोग किये जाने चाहिए । 

७.जिस स्कूल में कक्षा के अतिरिक्त शिक्षक से निजी तौर पर पढने को प्रेरित किया जाए ,ऐसे स्कूल में बच्चे को कभी न पढ़ाएं । शिक्षक ट्यूशन के नाम पर पैसा कमाने के उद्देश्य से कक्षा में ठीक से नहीं पढ़ाते और अपने उन ख़ास बच्चों को प्रायः परीक्षा में आने वाले प्रश्नों को 'इम्पोर्टेन्ट' के नाम पर 'आउट' भी कर दते हैं । बच्चे के अंक तो फिर अच्छे आने ही हैं और माँ-बाप समझते है उनका बच्चा बहुत अच्छा कर रहा है । आगे जाकर फिर ऐसे ही बच्चे निराश होते है और अपने माँ बाप को निराश करते भी हैं । 

८.विषय कितना भी दुष्कर हो उसमे रूचि उत्पन्न कर उसे अत्यंत सरल तरीके से पढ़ाया जाना चाहिए । इस अवस्था में बच्चा अपने विज्ञान के शिक्षक को सबसे अधिक विद्वान और ग्यानी समझता है ,और जो शिक्षक सरलता के स्थान पर उसे कठिन तरीके और भाषा से पढ़ाते हैं उनसे तो बच्चे भयभीत भी रहते हैं और उनसे कुछ भी पूछने का साहस नहीं कर पाते । बच्चे के मन में यह विश्वास होना चाहिए कि वह कितनी भी बेवकूफी की बात क्यों न पूछे ,उसे उसके प्रश्न का समाधान बगैर खिल्ली उडाये उसके शिक्षक द्वारा मिल जाएगा । विज्ञान और गणित तो संसार को सरल तरीके से समझने में सहायता करते हैं अगर यह विषय ही कठिन लगेंगे तब बच्चे इन्हें अपने आगे के जीवन में प्रयोग में कैसे लायेंगे । 

९.शिक्षा के इस भाग में स्कूलों में अनुशासन अत्यंत कठोर तरीके से लागू किया जाना चाहिए । समय का महत्व ,परस्पर मदद की भावना , शिक्षकों का सम्मान ,सत्य बोलना इन सब बातों पर कड़ाई से जोर दिया जाना चाहिए । 

१०.शिक्षकों को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे उनकी बातों को अत्यंत गंभीरता से लेते हैं और उनके आचरण को प्रायः आदर्श मानते है । घर में माँ -बाप कोई बात कितनी भी प्रबलता से कहे वह नहीं मानते और अगर वही बात स्कूल में शिक्षक कह दें तब उसे बच्चे गाँठ बाँध लेते हैं । 

               "बच्चे के भविष्य निर्माण के लिए सबसे महत्पूर्ण काल इसी भाग में निहित है । "          

9 टिप्‍पणियां:

  1. अब हमको एक स्कूल खोल लेना चाहिये। सुन्दर सीख!

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  2. कोई स्कूल खोलने और चलाने वाले पढ़ पाते यह पोस्ट...

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  3. गहन पड़ताल कर ली स्कूलों के चरित्र की , उपयोगी है !

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  4. आपने लिखा....हमने पढ़ा
    और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए कल 12/06/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    धन्यवाद!

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  5. आज कल स्कूलों में पैसा कमाने की अधिक रूचि राखी जाती है न कि शिक्षा की ....

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