रविवार, 2 जून 2013

" स्कूल कैसा हो ...............प्रथम भाग "


बच्चों की शिक्षा के चार भाग कहे जा सकते हैं :

१. नर्सरी से कक्षा ५ तक -प्रथम भाग 
२. कक्षा ६ से कक्षा १० तक -द्वितीय भाग 
३. कक्षा ११ से कक्षा १२ तक -तृतीय भाग 
४. जीवन यापन हेतु शिक्षा -अंतिम भाग 

इस पोस्ट में चर्चा प्रथम भाग की :

बच्चे की प्रथम किलकारी के साथ ही माँ बाप उसके सुनहरे भविष्य के सपने संजोने लगते हैं । अब तो दो या तीन वर्ष की आयु होते ही स्कूलों में प्रवेश की मारा मारी प्रारम्भ हो जाती है । आज की तारीख में स्कूल एक उद्योग की तरह पनप रहा है । स्कूल वालों को आपसे या आपके बच्चे से कोई सरोकार नहीं । वे भी समाज में स्थापित सबल और प्रभावशाली लोगों के बच्चों को अपने यहाँ प्रवेश दे कर अपनी ब्रांड वैल्यू बढाते हैं । आम आदमी इन्ही के चक्कर में पड़कर ऐसे स्कूलों के पीछे पड़े रहते हैं और दाखिला न मिलने पर मायूस खुद भी होते हैं और बच्चों के भाग्य को भी कोसते हैं ।  

छोटे से नन्हे मुन्नों का स्कूल कैसा भी हो ,पर ऐसा भी हो :

१. स्कूल घर से बहुत दूर न हो । इससे बच्चे की नींद भी पूरी होगी और आपकी भी । 
२. स्कूल में नैतिक शिक्षा ,अनुशासन ,व्यवहार और भाषा की शुद्धता पर विशेष ध्यान हो । 
३. क्लास छोटी छोटी हों । जिससे टीचर प्रत्येक बच्चे को नाम से जानते हों । 
४. बच्चा स्कूल से लौटने पर आपको उत्साहित मिले , वहां की बातें बताने को ,न कि आते ही अगले दिन जाने को मना करने लगे । 
५.साथ के बच्चे आर्थिक रूप से अत्यंत संपन्न परिवारों से हो सकते हैं ऐसे में स्कूल का दायित्व है कि अन्य साधारण बच्चों में अभाव की प्रवृत्ति कदापि न आने पाए । 

स्कूल में तो बच्चा मात्र ६ घंटे गुजारता है । शेष १८ घंटे स्कूल के बाहर बीतते हैं । अतः स्कूल से अधिक उत्तरदायित्व माँ बाप का होता है । ध्यान रहे स्कूल कैसा भी हो, बस कुछ सावधानियां आप भी बरते :

१. बच्चों के आगे स्कूल या टीचर की बुराई कभी न करें । 
२. प्रत्येक पी टी एम में अवश्य जाएँ और टीचर को ध्यान से सुने । उसकी बातों को इग्नोर कर अपनी बातें न थोपे । आपके बच्चे का भविष्य उसी के हाथों में हैं । अच्छे टीचर बच्चे के भावी गुणों को अपने अनुभव से शीघ्र जान लेते हैं । 
३. अगले दिन के स्कूल के लिए स्कूल बैग बच्चे से ही लगवाएं , वह कितना भी छोटा क्यों न हो ।इससे उसे अपने विषयों को पहचानने और पुस्तकों को पहचानने में मदद मिलेगी और आपका भी भरोसा उस नन्हे से बच्चे पर बढ़ता जाएगा । 
४. स्कूल से लौटने के बाद बच्चे की हर बात ध्यान से सुने । बात सार्थक हो या निरर्थक हो ,उसे समय और महत्त्व दें । 
५. बच्चे को रात्रि को जल्दी सुला दें ,सबेरे कभी उठाने में परेशानी नहीं होगी । 
६. अपना रूटीन भी बच्चे के रूटीन के अनुसार बना लें । 
७. बच्चे को स्कूल ले जाने वाले रिक्शे / ऑटो / बस का रूट आपको मालूम होना चाहिए । कभी कभार उसके पीछे पीछे भी जायें कि वह बच्चों को किस प्रकार हैंडल करता करता है और कैरी करता है । 
८.रिक्शेवाले / ऑटो वाले को जरूरत पड़ने पर भी डांटना अवाइड करें । आपके गुस्से का प्रतिकार वह बच्चे के साथ गलत व्यवहार से निकाल सकता है । 
९.बच्चे को होम वर्क कराते समय या पढ़ाते समय यह जानने की कोशिश करे कि वह कहाँ अटक रहा है । 
१०. याद करने वाली चीजों को सरल कर रोजमर्रा की घटनाओं से जोड़कर याद कराने की कशिश करें । 
११.बातचीत के दौरान बच्चा अपनी समझ से चीजों को समझाना चाहता है । उसे भी ध्यान से सुने और उसकी जिज्ञासा को शांत करने का सही प्रयास करें न कि ट़ाल दें । 
१२.आप किसी भी उम्र के क्यों न हो ,बच्चों को पढ़ाने के दौरान आप भी बहुत कुछ नया सीख सकते हैं । 

" मुझे बताने में कोई लज्जा नहीं है कि मेरी प्रारम्भिक पढ़ाई एक अच्छे कान्वेंट स्कूल में हुई थी और मुझे पहाड़े अंग्रेजी में सारे बखूबी याद थे ।' टू वन ज़ा टू' से लेकर 'टवेंटी टेन ज़ा टू-हण्ड्रेड' तक एकदम रटा पड़ा था परन्तु यह "ज़ा " क्या बला नहीं पता था । जब अनिमेष को पढ़ाने के लिए नर्सरी की टेबल की किताब देखी तब मुझे समझ आया कि अंग्रेजी के पहाड़े किस तरह टेक्स्ट फ़ार्म में लिखे जाते हैं ,जिन्हें हम लोग रट मारते थे और सच बात तो यह है कि जब यह राज़ खुला "ज़ा " वाला ,फिर जिस किसी से भी मैंने पूछा ,सही कोई न बता पाया । कुछ इस तरह होते हैं अंग्रेजी के पहाड़े : (हो सकता हो लोग जानते हो यह बात ,परन्तु मुझे नहीं पता थी ,इसीलिए शेयर कर रहा हूँ )   

two ones are two
two twos are four
two threes are six
...............................

किसी भी स्कूल के सारे बच्चे बहुत अच्छा नहीं करते । प्रत्येक स्कूल के कुछ बच्चे बहुत अच्छा करते हैं । प्रारंभिक स्कूल बहुत अच्छा मिल जाना इस बात की गारंटी कदापि नहीं है कि आपका बच्चा भविष्य को लेकर सुरक्षित हो गया है । 

बच्चों में अपार क्षमता होती है और प्रत्येक बच्चा यूनीक होता है ,उसकी इसी यूनीकनेस को बगैर ख़त्म किये बस उसे समझने की कोशिश करें और प्यार की थपकी दें ,वह बदले में आपको सितारे लाकर दे देगा आसमान से । 

"शिक्षा के द्वितीय भाग का स्कूल कैसा हो, अगली पोस्ट में ......"

8 टिप्‍पणियां:

  1. एक बेहद सार्थक और जरूरी पोस्ट है यह ... मुझे खुद लगा कि कार्तिक की पढ़ाई की शुरुआत मे हम लोगो से कुछ गलतियाँ हुई है ... पर अब भी देर नहीं हुई है ... सुधार की गुंजाइश है और इस की पहल इस साल उसका स्कूल बदलवाने से हो चुकी है !

    आगे की पोस्टों का भी इंतज़ार रहेगा !

    उत्तर देंहटाएं
  2. हमें हिन्दी के पहाड़े अभी तक रटे हैं, आपकी सारी सलाह सबके मनन योग्य।

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी अंतिम बात सबसे महत्वपूर्ण है. हर बच्चे में अलग-अलग क्षमताएं हो सकती है उसे किसी एक मान्य और पूर्व निर्धारित ढांचे में जबरदस्ती फिट करने की कोशिश कतई नहीं होनी चाहिए.

    उत्तर देंहटाएं
  4. two ones are two
    two twos are four
    two threes are six :-)

    ज्ञान सफल और लायक बच्चों के पिताजी के श्रीमुख से निकला है इसलिए कबूल है :-)
    थोडा(15-20 साल) पहले बताना था न....

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  5. "बच्चों में अपार क्षमता होती है और प्रत्येक बच्चा यूनीक होता है ,उसकी इसी यूनीकनेस को बगैर ख़त्म किये बस उसे समझने की कोशिश करें और प्यार की थपकी दें ,वह बदले में आपको सितारे लाकर दे देगा आसमान से ।"
    बहुत अच्छे विचार... सहमत हूँ... अनुभव की बात है

    उत्तर देंहटाएं
  6. आज के दौर का बेहद जरूरी विषय है ये.जबकि स्कूल अब किसी दूकान या होटल में तब्दील होते जा रहे हैं. ऐसे में शायद अविभावक ही कुछ बदलाव ला सकें.
    बहुत ही बारीकी से समझाया आपने.

    उत्तर देंहटाएं
  7. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन कभी तो आदमी बन जाओ - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    उत्तर देंहटाएं