मंगलवार, 13 मार्च 2012

" लट्टू और लत्ती ......."


बाएं हाथ में लट्टू पकड़ कर वह दाहिने हाथ से उस लट्टू पर लत्ती लपेट रहा था । लट्टू सफ़ेद डोरी (लत्ती) में यूं लिपटा जा रहा था ,जैसे शर्माते हुए जल्दी जल्दी अपना बदन ढक रहा हो,सफ़ेद धारीदार कपड़ों में ।  पूरा लपेटने के बाद उसने दाहिने हाथ में लत्ती का थोड़ा सा सिरा पकड़ा और अपने हाथ को पीछे खींचते हुए लट्टू को जमीं पर पटक दिया । अब लट्टू नाच रहा था ,ज़मीन पर , गोल गोल एकदम भन्नाते हुए । जब नाचना बंद हुआ ,लट्टू थक कर लुढ़क चुका था ज़मीन पर वो भी एकदम निर्वस्त्र ।

घर से निकलते समय रोज़, वह यह सोच घबराती थी कि चौराहे पर पहुँचते पहुँचते घर से चौराहे के बीच, फिर न जाने कितनी जोड़ी निगाहें उसके बदन पर खींचेंगी, अक्षांश- देशांतर की रेखाएं और लपेटेंगी नज़रों की लत्ती उसके बदन पर चारों ओर ,फिर वे निगाहें मन ही मन खींचेंगी उस लत्ती को जोर से, और महसूस करती  रहेंगी , उसका नाचना, गोल गोल ,वह भी बिना कपड़ों के । जब तक वो रास्ता पार होगा ,वह ढुलक कर गिर चुकी होगी अपनी खुद की ही निगाहों में । लट्टू के पास तो वार करने के लिए छोटी सी लोहे की कील भी थी ,पर उसके पास तो वह भी नहीं ।

9 टिप्‍पणियां:

  1. ओह!!!
    मार्मिक लेखन....

    अदभुद कल्पनाशीलता अमित जी....

    सादर.

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  2. लट्टू तो अपनी धुरी पर नाचता है..बहुत गहरी कल्पना और साम्य।

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  3. बहुत ही गहन भाव लिए हुए ...यह प्रस्‍तुति ।

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  4. कील होती भी तो उसी को चुभोती रहती..

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