शनिवार, 16 जुलाई 2011

"माँ"

माँ !
एक ओस की बूंद, 
जिसमे चमक सूर्य सी, 
शीतलता अमृत सी, 
तरल सी फिर भी समग्र, 
माँ !
घने पेड़ की छाया सी, 
बयार एक मंद मंद सी, 
मीठी नदी सी, 
माँ !
पास हो, ना हो, 
बस हो, चाहे जहाँ भी हो, 
एक ऐसा सहारा सी, 
माँ !
सूखी  रोटी पर गुड़  की  डली  सी,
जिसके होने पे,
लगे सारी दुनिया अपनी सी, 
और ना होने पे,
कोई ना अपना सा, 
माँ !
तुम बस माँ हो, 
माँ !!

13 टिप्‍पणियां:

  1. आप का बलाँग मूझे पढ कर अच्छा लगा , मैं भी एक बलाँग खोली हू
    लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/

    आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें.
    अगर आपको love everbody का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।
    --
    hai

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  2. बहुत जोरदार प्रस्तुति ||
    माँ सब की माँ
    सादर प्रणाम ||

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  3. बहुत सुन्दर .....माँ को समर्पित इस रचना के लिए बहुत -बहुत बधाई

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  4. मां को समर्पित सुंदर भावपूर्ण अभिव्यक्ति

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  5. माँ को समर्पित रचना जो मन को गहराई तक छू गयी !

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  6. वाकई उनका कोई मुकाबला नहीं ...... वे हैं वहीँ सब कुछ है ...
    शुभकामनायें !

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  7. सच है माँ की व्याख्या नहीं हो सकती... मां तो बस मां है॥

    एक सुझाव--- फ़ांट थोडा बडा रखिए :)

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  8. sahi kaha aapne maa to bas maa hai... shabdon se pare...achha laga apko padkar

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  9. माँ के प्रति आस्था बढ़ जाती है...जब पत्नी का बच्चों के प्रति त्याग देखता हूँ...

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  10. amit ji..

    achank aapke blog pr maa kavita pdne mili ..
    dilkochhu gai ,,badhai,,,,,
    prakashpralay ktni m.p.....

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