बुधवार, 23 मार्च 2016

" वक्त के रहल पे..........."

अक्स कुछ यूँ था उनका कि उनसे रश्क हो गया,
न जाने कब उन्हीं से क्यूँ तब इश्क हो गया ।

आँखों ही आँखों में उस दिन जब इज़हार हो गया ,
सुर्ख गाल उनका खुद इश्के-इश्तिहार हो गया ।

नज़रें मिली उन शोख नज़रों से जब मेरा तो वुज़ू हो गया ,
उनसे इश्क थी इबादत मुझको इश्क अब इबादत से हो गया ।

कल ख्वाब की नींद में एक गुनाह ख्वाहिश सा हो गया ,
पलकों को उनकी चूम लबों से एक दास्ताँ लिख गया  ।

चंद अल्फ़ाज़ थे या थे कुछ हर्फ़ ,सब न जाने कहाँ खो गया ,
वक्त के रहल पे एहसास उनका एक किस्सा सजा  गया ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 24-03-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2291 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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