शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2014

" हर मुड़ा तुड़ा कागज कचरा नहीं होता ......"


हर मुड़ा तुड़ा कागज कचरा नहीं होता ,
आंसुओं संग बह जाये वह कजरा नहीं होता ,

मुड़े तुडे कागज़ अक्सर होते हैं खत मोहब्बत के ,
 लफ्ज़ जिसके हरेक जुगनू होते हैं 'उन' नज़रों के ,

ऐसा ही टुकड़ा एक दबा रह जाता है अक्सर नीचे तकिये के ,
और कर देता है उस ओर मुझे 'उनकी' यादों के हाशिये के ।

हाशिये पर ही ठहर गई फिर एक बार कलम उनकी  ,
दिल कह रहा है आंसुओं से बन जाओ अब स्याही उनकी ।

हाँ ,यह सच है आँखें आँसू बहाना चाहती हैं ,
यह भी सच है , कोई तो 'बहाना' चाहती हैं । 

11 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना शनिवार 04 अक्टूबर 2014 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. मुड़ा हुआ कागज़ भी ज़ज्बातों की कहानी बयाँ कर जाता है

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  3. यह भी सच है कोई तो 'बहाना' चाहती हैं ...... भावमय करते शब्‍द

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  4. हाँ ,यह सच है आँखें आँसू बहाना चाहती हैं ,
    यह भी सच है , कोई तो 'बहाना' चाहती हैं ।
    waah...behatreen

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  5. हाँ ,यह सच है आँखें आँसू बहाना चाहती हैं ,
    यह भी सच है , कोई तो 'बहाना' चाहती हैं ।

    बहुत ही भीगी-भीगी सी रचना ! हर लफ्ज़ मन की टीस को अभिव्यक्त करता है और दर्द की रवानी को गति देता है ! बहुत सुन्दर रचना !

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  6. हर मुड़ा तुड़ा कागज कचरा नहीं होता ,
    आंसुओं संग बह जाये वह कजरा नहीं होता ,
    ...बहुत सही ..

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  7. Nice Article. I m always Read your articles. It's realy Enjoyable. Thanks For Sharing with us. Ind Govt Jobs

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  8. यह भी सच है , कोई तो 'बहाना' चाहती हैं ।

    ....-भीगी सी रचना !

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  9. हाँ सच है आंसु को बहने का बहाना तो चाहिए

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