सोमवार, 14 अप्रैल 2014

" इंटरव्यू ...एक जेबकतरे का ...."


यह उन दिनों की बात है जब शाहजहाँपुर तैनाती के दौरान प्रायः ट्रेन से लखनऊ से आवाजाही लगी रहती थी । एक बार स्लीपर क्लास में दो सिपाही एक मरियल से लडके को लेकर चढ़े थे । उस लडके के हाथ में हथकड़ी पड़ी थी । बर्थ पर खिड़की की तरफ मैं था और मेरे बगल उस लडके को बिठा कर उसकी बगल में वह दोनों सिपाही बैठते ही अपनी रायफल के सहारे ऊँघने लगे थे । पहले तो मैं बड़ी हिकारत से उस लडके को देख रहा था और उन सिपाहियों को गुस्से से बोलने वाला था कि ऐसे कैसे स्लीपर में अपराधी को लेकर चढ़ गए । फिर मैंने सोचा क्या फ़ायदा ,यह तो इनका रोज़ का पेशी के लिए आना जाना है ,बेकार में पंगा क्या लेना । इससे बेहतर है इस लडके से बात चीत कर कुछ समय गुजारा जाय ।

मैंने उस लड़के से पूछा ,क्या गुनाह कर डाला जो यह हथकड़ी लगी है । खिसियाते हुए वह बोला पॉकेटमारी की है मैंने । अरे तो पाकेटमार तो बहुत होशियार होते हैं कैसे पकड़ गए तुम । इस पर वह बहुत दार्शनिक अंदाज़ में बोला , बस टाइम ख़राब था ,साहब । मैंने कहा चलो कोई नहीं ,अगली बार सावधानी बरतना और हाँ ,मुझे इतना जरूर बता दो कि पॉकेटमारी से बचने के लिए मुझ जैसों को क्या करना चाहिए ।

इस पर उसने बताया कि पहचानने के लिए जान लीजिये कि जेबकतरा हमेशा मरियल सा और कमजोर सा दिखने वाला लड़का ही होता है । उसको सपोर्ट करने के लिए उसके पीछे मजबूत लडके होते हैं । कई बार पकड़े जाने पर कमजोर से लडके को बिना मारे पीटे लोग छोड़ देते हैं । आगे उसने बताया कि  पॉकेटमारी से बचने के लिए सबसे सुरक्षित जेब कमीज़ या कोट की ऊपर की होती है और अगर उसी जेब में कुछ सिक्के भी पड़े हों तो और भी बेहतर क्योंकि सिक्के अलार्म का काम करते हैं । किसी ने हाथ लगाया नहीं कि खनखना उठती है जेब । सबसे असुरक्षित जेब पीछे वाली होती है । कई बार तो लोग दोनों हाथ से बस अथवा ट्रेन का डंडा पकड़ कर उतरते रहते हैं और उनकी आँखों के सामने उनकी पीछे की जेब से बटुआ मार देते हैं ,अब अगर हाथ छोड़ेंगे तो जान से ही जाएंगे । वैसे जींस में सामने की जेब भी काफी सुरक्षित होती है ।

उस जेबकतरे ने आगे बताया कि अक्सर हम लोग यह जानने के लिए कि लोगों ने पैसा अथवा बटुआ कहाँ रखा है ,अचानक से कहते हैं कि अरे किसी का बटुआ तो नहीं गिरा है । यह सुनते ही स्वाभाविक रूप से हर व्यक्ति अपना हाथ वहीँ ले जाता है जहाँ उसने रूपया रखा हुआ है । हमारे दूसरे आदमी बस इसी को देखते रहते हैं और जानकारी हो जाती हैं कि माल कहाँ है ।

जेब हमेशा शिकार की गतिशील अवस्था में काटी जाती है । चलती ट्रेन अथवा बस में जेब कभी नहीं कटेगी । जैसे ही ट्रेन / बस रुकती है और मुसाफिर गतिशील होते हैं या जब सिनेमा का शो छूटता है ,बस उसी समय जेब काटने का सबसे मुफीद समय होता है । सारे रास्ते लोग बहुत होशियार रहते हैं पर घर के निकट पहुंचते ही असावधानी कर बैठते हैं ।जब किसी के दोनों हाथ व्यस्त होते हैं ,जैसे मंदिर में प्रसाद लिए हुए अथवा हाथों में बच्चे को लिए हुए या एक हाथ में मोबाईल लिए और दूसरे में कोई भारी सामान वगैरह लिए हुए व्यक्ति भी जेबकतरे का आसान टारगेट होता है ।

पॉकेटमारी से  बचने का सबसे आसान उपाय बटुआ ऊपर की जेब में रखे । रूपया दो तीन जगह रखें । अधिक धन लेकर न चलें । प्लास्टिक मनी का उपयोग सर्वाधिक करें । यह कभी न सोचें कि आपके साथ ऐसा नहीं हो सकता ।

मैंने सोचा ,यह ऐसे ही सबको बताता फिरेगा तो इसका तो धंधा चौपट हो जाएगा । मेरी बात चीत सुनकर दोनों सिपाहियों में से एक आँखों आँखों में ही मुझे टटोल कर बोला ,क्या बात है ,बहुत इंट्रेस्ट ले रहे हो । बड़ी बारीकी समझ रहे हो इस धंधे की ।

मैंने मन ही मन कहा तुम नहीं समझोगे । मैं भी ठहरा पाकेटमार ,देखो उस जेबकतरे की जेब से कुछ तो माल निकाल लाया और अब उड़ेल भी दिया सब के सामने ।  

22 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन सावधानी हटी ... दुर्घटना घटी - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. ''कुछ सिक्के भी पड़े हों तो और भी बेहतर क्योंकि सिक्के अलार्म का काम करते हैं'' यह बहुत ही अच्छा आइडिया है.......

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  3. हम्म.. यानि आसान काम नहीं है ये भी :(

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  4. पहली बात- आप तो गुरु निकले!
    दूसरी बात- पता लगा जेबकतरे भी गुरु हो सकते हैं, ज्ञान के भंडार!!
    तीसरी और आखरी बात- आपने गुरुदक्षिणा दी कि नहीं? देखना, चौकन्ने रहना वरना ऐसा न हो वह भविष्य मे खुद गुरुदक्षिणा ले ले...

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  5. बढ़िया है... किसी भी को सीखना बुरा कहाँ है ? :)

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  6. एक बार कानपुर में कटी है, १०० रुपये ही थे तब।

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  7. ट्रेन/बस में आपके आसपास अनावश्यक रुप से भीड लगे या आपके पेट, पीठ पर दबाव महसूस हो तो समझियेगा आपकी जेब गई :-)
    इनके गिरोह का एक आदमी इस प्रकार की मुद्रा बनाता है कि उसकी कोहनी आपके पेट में चुभती है और आपका ध्यान जेब से हट जायेगा।
    दिल्ली की प्राईवेट बस में जेब कटने के तुरन्त बाद किसी के उतरने से पहले अगर आपको पता चल जाये तो कंड्क्टर सीट के नीचे जरुर चैक करें। 90% आपका पर्स वहीं मिलेगा।

    प्रणाम

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  8. एक आई पी एस अफसर ने जेबकतरों पर पी एच डी की थी...आपने उनकी पूरी साइकोलॉजी बता दी...

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  9. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 17-04-2014 को चर्चा मंच पर दिया गया है
    आभार

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  10. बढ़ि‍या बता गया जेबकतरा...अब कई लोग सावधान हो जाएंगे.. :)

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  11. कल 20/04/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  12. तो हमाम में हैं एक से बढ़कर एक पॉकिटमार.. हैं न ?

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  13. जेबकतरों से बचने की बहुत अच्छी टिप मिली. पॉकेटमार इतने शातिर होते हैं की क्षण भी नहीं लगता और हाथ साफ़ कर जाते हैं. मेरे बड़े पर्स में से छोटा पर्स मार लिया और मुझे पता भी न चला. गज़ब की फुर्ती और चुस्ती होती है इनकी. लाख सावधानी बरतो होना है तो हो ही जाता है.

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  14. एक बार दिल्ली में कटी है, 2०० रुपये ही थे तब से सावधान रहना पढता है पता ही नहीं चल कब उड़ा लिए पैसे

    Recent Post वक्त के साथ चलने की कोशिश

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  15. आपने अपने लिए पूछ लिया। साड़ी, शलवार कमीज़ और दोनों हाथों में कई कई काम से लड़ी फाड़ी चलनेवाली महिलाओं के लिए भी कुछ पूछ लिया होता। मेरे कई बार पॉकेटमारी कहें या परसामारी, हो चुकी है। ...वैसे, अच्छी जानकारी दी। पिछले साल इलाहाबाद से गोरखपुर अपने नाटक के शो के लिए जाते समय मेरे ही बर्थ के सामने एक कैदी को सिपाही ले जा रहे थे। कैदी तो मजे में सो गया। तीनों सिपाही और उनके इंस्पेक्टर जागते रहे। जागते हम भी रहे, क्योंकि हम अपने नाटक की रिहर्सल कर रहे थे। इस तरह से उनके तनाव युक्त समय को थोड़ा सहज कर दिया।

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  16. अजीब जेब कतरा था जो अपने व्यापार का राज बतला गया..उसी की जेब कटने के लिए साधू-वाद

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  17. बहुत सारा ज्ञान दे गया ...कमजोर और मरियल वाले बात तो सही है...अक्सर ऐसे ही लोग चोरी करते हैं .
    महिलाओं का एक मैं बता देती हूँ , स्लिंग बैग हो तो पर्स को सामने कर के फिर शॉपिंग करें .वरना आप शौपिंग में बिजी रहेंगी और कोई पर्स ले उड़ेगा (भुक्तभोगी हूँ )

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