"बस यूँ ही " .......अमित

"शब्द भीतर रहते हैं तो सालते रहते हैं, मुक्त होते हैं तो साहित्य बनते हैं"। मन की बाते लिखना पुराना स्वेटर उधेड़ना जैसा है,उधेड़ना तो अच्छा भी लगता है और आसान भी, पर उधेड़े हुए मन को दुबारा बुनना बहुत मुश्किल शायद...।

गुरुवार, 23 जुलाई 2026

मोहब्बत।

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ख़ुदा खुद को हम भी न समझ बैठें, इतनी जल्दी भी मोहब्बत तुम कुबूल न कर लेना। ये माना कि तपिश है कुछ उधर भी, दस्तूर मोहब्बत के भी आसां कहाँ होते...
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शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

लकीरें वक्त की।

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तुम्हारा वक्त कुछ अलग सा चलता और हमारा कुछ अलग सा ही रहता। बेचैन तुम भी और सुकून हमे भी नही।  हाथ मिलाने से लकीरें क्यों नही मिल जाती आपस मे...
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काजल बनाम रात।

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'रात' अब उतनी गाढ़ी नही होती कि उस के आर पार न दिखाई दे।रात के उस पार उजाला सा रहता है जिसे इस पार से छूने की ख्वाहिश में...

बेतरतीब।

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सबसे बेतरतीब बादल होते हैं और उतने ही साधारण भी। बादल का चित्र बनाना कितना आसान होता है । चिटकी जमीन हो या हो कच्ची दीवार,कहीं भी दो क्षण नि...
शनिवार, 4 जुलाई 2026

आँखें

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वो : आंखों में जो लाल डोरे से होते हैं न, दरअसल वो क्यू आर कोड होते हैं। उनमें देखते ही सारी बात दिल की जुबान पर आ जाती है। हम :...
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गुरुवार, 2 जुलाई 2026

बारिश संग भुट्टा।

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बारिश में ड्राइव करते हुए भुट्टा खाना मेरी पसंद की लिस्ट में सबसे ऊपर है। एक हाथ से ड्राइव और दूसरे हाथ मे भुट्टा घुमाते घुमाते ...
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मंज़िलें।

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 #मंजिल #मकान #की #या #ज़िन्दगी #की मकान ऊँचा था , इंसान इतराया, वक्त भी बौना लगा। वक्त रीता , रीता रेत भी , आसमान मुस्कुराया। वक्त फिसल गया,...
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