"बस यूँ ही " .......अमित

"शब्द भीतर रहते हैं तो सालते रहते हैं, मुक्त होते हैं तो साहित्य बनते हैं"। मन की बाते लिखना पुराना स्वेटर उधेड़ना जैसा है,उधेड़ना तो अच्छा भी लगता है और आसान भी, पर उधेड़े हुए मन को दुबारा बुनना बहुत मुश्किल शायद...।

बुधवार, 26 अगस्त 2026

थोड़ा आगे ,ज्यादा पीछे।

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पंखे का रेगुलेटर अगर पांच ( मैक्सिमम ) पर हो और तब भी आपको हवा कम लग रही हो तो ऐसे में अनजाने में आप रेगुलेटर को एक टर्न और दे देते हैं। ऐसा...
शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

और मैं सूफ़ी हो गया।

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तुम्हारी अंगुलियां कलम सी है जो लिखती है रोज़ कुछ लम्हे मेरी ज़िंदगी मे। उन अंगुलियों से अपनी हथेली पर एक तारा बनाना चाहता हूँ,फिर जब कभी भी अ...
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बुधवार, 5 अगस्त 2026

चाँद पहलू में।

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नींद खुल गई अचानक जब लगा कि किसी ने खिड़की थपथपाई हो आहिस्ते से। हल्के से दरार सी बनाते हुए पल्लों के बीच से झांका तो पीली पीली स्ट्रीट लाइट ...
शनिवार, 1 अगस्त 2026

एक ख़त प्यारा सा।

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मैं ख़ुद तो सुबह की चाय नहीं पीती पर बाक़ी सबके लिए चाय बनाते वक्त आपकी चाय और अरारोट के बिस्किट याद आये जो आपने मुझे सजेस्ट किए थे। आज भी म...
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गुरुवार, 23 जुलाई 2026

मोहब्बत।

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ख़ुदा खुद को हम भी न समझ बैठें, इतनी जल्दी भी मोहब्बत तुम कुबूल न कर लेना। ये माना कि तपिश है कुछ उधर भी, दस्तूर मोहब्बत के भी आसां कहाँ होते...
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शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

लकीरें वक्त की।

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तुम्हारा वक्त कुछ अलग सा चलता और हमारा कुछ अलग सा ही रहता। बेचैन तुम भी और सुकून हमे भी नही।  हाथ मिलाने से लकीरें क्यों नही मिल जाती आपस मे...
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काजल बनाम रात।

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'रात' अब उतनी गाढ़ी नही होती कि उस के आर पार न दिखाई दे।रात के उस पार उजाला सा रहता है जिसे इस पार से छूने की ख्वाहिश में...
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