शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

और मैं सूफ़ी हो गया।

तुम्हारी अंगुलियां कलम सी है जो लिखती है रोज़ कुछ लम्हे मेरी ज़िंदगी मे।

उन अंगुलियों से अपनी हथेली पर एक तारा बनाना चाहता हूँ,फिर जब कभी भी अंधेरा महसूस करूं तो वह तारा चमक उठे और रोशनी सी बिखेर दे मेरी ज़िंदगी मे।

पता है,जब भी रेंगती है तुम्हारी अंगुलियां मेरी अंगुलियों के बीच ,हर्फ उग आते हैं तुम्हारे ही नाम के ,पोर पोर पे, मेरी अंगुलियों के।

अबकी मिलना न ,तो अपनी अंगुलियों से मेरी हथेली पर  लिख देना बस एक लफ्ज़ 'प्यार'।

फिर मैं सूफ़ी हो जाऊं शायद।

©अमित

1 टिप्पणी:

  1. फिर मैं सूफ़ी हो जाऊं शायद
    इस शायद की क्या जरूरत
    शानदार है सूफियाना अन्दाज

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