शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

और मैं सूफ़ी हो गया।

तुम्हारी अंगुलियां कलम सी है जो लिखती है रोज़ कुछ लम्हे मेरी ज़िंदगी मे।

उन अंगुलियों से अपनी हथेली पर एक तारा बनाना चाहता हूँ,फिर जब कभी भी अंधेरा महसूस करूं तो वह तारा चमक उठे और रोशनी सी बिखेर दे मेरी ज़िंदगी मे।

पता है,जब भी रेंगती है तुम्हारी अंगुलियां मेरी अंगुलियों के बीच ,हर्फ उग आते हैं तुम्हारे ही नाम के ,पोर पोर पे, मेरी अंगुलियों के।

अबकी मिलना न ,तो अपनी अंगुलियों से मेरी हथेली पर  लिख देना बस एक लफ्ज़ 'प्यार'।

फिर मैं सूफ़ी हो जाऊं शायद।

©अमित

बुधवार, 5 अगस्त 2026

चाँद पहलू में।

नींद खुल गई अचानक जब लगा कि किसी ने खिड़की थपथपाई हो आहिस्ते से। हल्के से दरार सी बनाते हुए पल्लों के बीच से झांका तो पीली पीली स्ट्रीट लाइट अंदर लुढ़कती हुई आ गिरी। लगा जैसे चाँद खिड़की से गुलेल पर रोशनी चढ़ा कर अंदर निशाना साध रहा हो।

पीली रोशनी में चाँद घुला घुला सा लगता है। अब पूरी खिड़की खोल दी मैंने और स्ट्रीट लाइट का पीला बल्ब निहार रहा हूँ ,लग रहा है जैसे चाँद उलझ गया हो बिजली के तारों में और कसमसा सा रहा है इन तारों के बीच।

मेरे आगोश में भी जब कभी चाँद कसमसाता है तो रोशनी कुछ यूँ ही पीली हो जाती है।

©अमित

शनिवार, 1 अगस्त 2026

एक ख़त प्यारा सा।

मैं ख़ुद तो सुबह की चाय नहीं पीती पर बाक़ी सबके लिए चाय बनाते वक्त आपकी चाय और अरारोट के बिस्किट याद आये जो आपने मुझे सजेस्ट किए थे।

आज भी मैं चाय बनाते वक्त एक गीत गुनगुना रही थी उस गीत में नायिका अपने नायक को कहती है कि शायद अब इस जन्म में मुलाक़ात हो न हो। 

तभी चाय पर उबाल आ गया। मैं उबाल को गैस धीमा करके  नीचे धकेलना चाहती थी मगर ठीक उस वक्त मुझे आपकी इतनी गहरी याद आई कि मैंने पेन को बर्नर से उतार दिया। 

चाय का उफान उतर चुका था मगर मेरे मन में बरबस एक उफान उठ खड़ा हुआ. चाय छानते हुए मैंने सोचा आपकी तन और मन की स्थिति कैसी होगी या अभी भी उदास होंगे या बीमारी से लड़कर खुद की साँसों का अनुशासन साध लिया होगा.

आज आपका बर्थडे था तो उगते सूर्य के साथ ही मैंने आपको बड़ी शिद्दत से याद किया। यादों की एक सबसे खराब बात यह होती है कि ये अपनी सुविधा से आती हैं भले ही हम उसके लिए तैयार हो या न हो। यादें आकर हमें हद दर्जे तक अस्त-व्यस्त करने की जुर्रत रखतीं हैं।

आज चाय के बहाने आपकी याद आई पर मुझे लगता है याद के लिए किसी बहाने की जरूरत नही होती है।

सुबह ही सोचा कि आपसे सही समय लेकर आपको फोन करूँगी मगर दिन चढ़ते-चढ़ते जिम्मेदारियों को पूरा करते करते यह विचार भी निस्तेज होकर मन से बह गया। 

मैं देर तक सोचती रही कि याद आने और बात करने में कोई सह-सम्बन्ध हो है नही इसलिए किसी की याद आने पर उसे क्या फोन करना, हो सकता है मैं आपको उस  दिन फोन करूं जिस दिन मुझे आपकी बिल्कुल याद न आई हो. 

फोन शायद एक जरूरत से,शिष्टाचार से जुड़ी क्रिया है और यादें किसी जरूरत की मोहताज़ नही हैं।

रात होते होते आपकी याद मुझे खुद से बेदखल न कर दें इसलिए मैंने तय किया है कि आज देर शाम अपनी फेवरेट कॉफ़ी की  जगह चाय ही पिऊँगी और ईश्वर से प्रार्थना करूँगी कभी आपसे चाय पर चर्चा या कॉफ़ी पर कन्वर्सेशन ज़रूर हो ❤️