बहुत पहले एक 'बेशरम' का पेड़ दिख जाता था सभी जगह, लोग अपनी क्यारियों की उससे फेंसिंग भी करते थे। उसमे सफ़ेद रंग का फूल आता था।
यह पेड़ लचकदार टहनी का होता था और इसकी सन्टी बहुत मस्त बनती थी, सरकारी स्कूल के मास्टर लोगों की फेवरिट।
"शायद उस पेड़ का मानवीकरण हो गया अब।"
यह पोस्ट पढ़कर बचपन की बहुत सी यादें ताज़ा हो गईं। सच में, बेशरम का पौधा कभी हर गाँव और खेत के किनारे दिख जाता था। उसकी टहनियों से बनी संटी और स्कूल के दिनों की शरारतें आज भी याद आ जाती हैं। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.
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धन्यवाद
वाह
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