"शब्द भीतर रहते हैं तो सालते रहते हैं,
मुक्त होते हैं तो साहित्य बनते हैं"। मन की बाते लिखना पुराना स्वेटर उधेड़ना जैसा है,उधेड़ना तो अच्छा भी लगता है और आसान भी, पर उधेड़े हुए मन को दुबारा बुनना बहुत मुश्किल शायद...।
शुक्रवार, 17 जुलाई 2026
लकीरें वक्त की।
तुम्हारा वक्त कुछ अलग सा चलता और हमारा कुछ अलग सा ही रहता। बेचैन तुम भी और सुकून हमे भी नही।
हाथ मिलाने से लकीरें क्यों नही मिल जाती आपस मे।
पर दो तरह के वक्त आपस मे घुलते नही शायद। वक्त के भी बहुत से रंग होते हैं।
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंसुन्दर प्रस्तुति.
जवाब देंहटाएंलाजवाब, दिल को छू गई!!!
जवाब देंहटाएंउत्तम विचार भाई
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया
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