गुरुवार, 2 जुलाई 2026

बारिश संग भुट्टा।



बारिश में ड्राइव करते हुए भुट्टा खाना मेरी पसंद की लिस्ट में सबसे ऊपर है। एक हाथ से ड्राइव और दूसरे हाथ मे भुट्टा घुमाते घुमाते खाते हुए गाना सुनने का एक अजीब सा मिजाज होता है। 

निगाह तो सामने सड़क पर होती है और गोल घुमाते हुए भुट्टे के दाने दांतों के नीचे आते रहते है। कभी कच्चा सा दाना कच से अपना दूध छोड़ देता है तो कभी एकदम जला हुआ दाना कर्र कर्र करता हुआ कोयला सा जीभ पर ठहर उठता है।

यह रोटेटिंग भुट्टा हाथ मे एकदम ज़िन्दगी की तरह ही तो होता है, कभी चटपटा कभी ,कचकचा और कभी जला हुआ फिर भी स्वाद देता हुआ और सबसे खास बात यह कि जब  और खाने का मन करता है तभी एकदम से खत्म हो जाता है।

यही ज़िन्दगी है।

मंज़िलें।

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मकान ऊँचा था ,

इंसान इतराया,

वक्त भी बौना लगा।

वक्त रीता ,

रीता रेत भी ,

आसमान मुस्कुराया।

वक्त फिसल गया,

हाथ छूट गया,

इंसान बौना रह गया।

सीमेंट रेत सरिया,

खुद कभी मजबूत कहाँ,

वक्त ही निभाता इन्हें।

"वक्त गर मजबूत ,

झोपड़ी को भी हासिल हुनर ,

पनाह का महलों को।"


©अमित